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Tuesday, April 26, 2016

Aasaan hai!

Kisi ka dil dukha kar, maafi maang lena...  Aasaan hai
Kisi ko thokar maar kar, hath badha dena... Aasaan hai
Kisi ko aansu de kar, khush rehne ki dua dena... Aasaan hai
Kisi ko zakhm de kar marham lagana bhi... Aasaan hai
Kisi ko apna bana kar, paraya kar dena... Aasaan hai
Insaano k beech reh kar, Insaniyat ko bhool jana... Aasaan hai
Khamoshi ko shor se dabana... Aasaan hai
Kuch zaruri shabdoN ko khamoshi se kuchal dena bhi... Aasaan hai



Mushkil hai... kisi ko taklif mein sahara dena
Mushkil hai... Kisi ko khushi k aansu dena
Mushkil hai... Kisi paraye ko apna banana
Mushkil hai... kisi apne ka har haal mein sath nibhana
Mushkil hai... kisi tanha dil ko behlana
Mushkil hai... kisi ki khamosh Zuban padh pana
Insaniyat ko zinda rakh pana ... Mushkil hai 

Tuesday, August 20, 2013

बस.. चलती चली गई

वो छोटी थी
उम्र हो या तजुर्बा
मगर समझती थी सब
या यूँ कहो
नादान नहीं थी
बस.. छोटी थी
बात बड़ी करे.. तब भी


दुनियादारी नहीं जानती
ज़िम्मेदारी समझती थी
साझेदारी में यकीन रखती
भोली थी
मगर बेवकूफ नहीं

सबकी सुनती
दिल से करती भी
रिश्ते निभाती थी
पर दलदल में पाँव रखती
समझ नहीं पाई थी
कहाँ जा रही थी
बस..
चलती चली गई

अपने थे सब
पर अब अपने नहीं थे
न दोस्त न रिश्तेदार
बरबस समझ गई थी
कि कहीं छूट गया है
उनका प्यार

प्यार की चाह में
अपनत्व की लालसा में
अगला कदम बढ़ाती
मगर हर कदम
दलदल गहरी हो जाती थी


कहती किसे
लड़ती ही थी
अपनी सोच से
कभी भरोसे से
अपने ही दिल से
असीम जद्दोजहद।
ज़हन में जो लड़ाई
वो लड़ रही थी
सो अलग..

मकसद एक था
मिलना चाहती थी
अपनेआप से
'कहीं खो गई हूँ'
वह ढ़ूँढ़ रही थी
अपनेआप को 
जहाँ सालों पहले थी

हाँ
कुछ महीने नहीं
बरस बीत गए थे
उम्र अब भी छोटी थी

दरअसल
कुछ नहीं चाहिए था
फिर भी
खोज रही थी बहुत कुछ
जो न मिलने पर
हताशा, उदासी..
मगर हारी नहीं थी

विश्वास था
पा लेगी वो
पैसा, शौहरत और चालाकी..
से बहुत परे...
अपने अपनों को वापस

साथ हो पिता का
या माँ का प्यार
भाई-बहन की दोस्ती हो
या दोस्तों का विश्वास
पा तो लेगी ही

शायद गलत थी
मगर सच्ची तो थी
शायद मंज़िल न थी
मगर दिशा तो थी
शायद अकेली थी
पर सबके साथ तो थी
शायद याद न थी किसी को
मगर उसके होठों पर
सबके लिए फरियाद तो थी...


Friday, June 28, 2013

कह नहीं पाई..

बहुत चाहती हूँ तुम्हें                                                                             
कह नहीं पाई कभी
नहीं जानती....
शर्म है, या...
कोई डर

बेइन्तहा प्यार दिया है
तुमने
बिना किसी स्वार्थ
बिना किसी उम्मीद के

हाँ,
कभी- फटकारा भी
और तिलमिला कर शायद...
हाथ भी उठा दिया
पर क्या फर्क पड़ता है,
हक है आख़िर

बांहों में भी तो भर लिया,
पलक की एक ही झपक में
जाने कितनी दफ़ा,
बुरा बनना पड़ा तुम्हें
ज़माने के आगे..
कभी मना तो नहीं किया
झिझक नहीं आई चेहरे पर

बदले में माँगा क्या..
प्यार के अलावा?
कुछ भी तो नहीं
बस प्यार और ...
साथ
अपने ही अक्स का साथ

हर दुख हँस कर सह जाना
तुम ही से तो सीखा है
तुम ही ने तो बार- 
हर बार..
गिरने पर उठना सिखाया
उठ कर आगे बढ़ना

अदा करना तो चाहती हूँ
मगर किन शब्दों में,
किस रूप में करूँ
तेरा शुक्रिया अदा

कहा तो नहीं पर
एक डर है मन में
भीतर कहीं..
एक कोने में...
दुबक कर बैठी हूँ 
अपने ही दिल के

डरती हूँ 
अपने ही ख़यालों-रुपी जाल से
मानो जकड़ सी गई हूँ
इन के बीच कहीं..

जैसे पुलिस-चोर का खेल
खेल रहे हों मेरे साथ
धमकाते हैं
खो दूँगी तुम्हें भी
कहीं खो दूँगी
और शायद ...
अपना अस्तित्व
अपना वजूद भी ..

कहा तो नहीं
बस..
कह ही नहीं सकी
कि कहीं जाना मत
प्यार करती हूँ तुमसे
बहुत प्यार, बेहद

उल्टी-सीधी बातों
मेरी नादानियों
कभी बद्तमीज़ी,
तो कभी बेरुख़ी के लिये
माफ़ी माँगना चाहती हूँ

माफ़ तो करोगी
करुणामयी हो,
नर्मदिल, और..
बड़े दिल वाली भी
जानती हूँ 
माफ़ कर दिया है तुमने
भले मैं लायक नहीं

बस इतनी गुज़ारिश है
छोड़ के जाना कभी
इतनी सी दुआ है माँ
उम्र लग जाए तुम्हें मेरी

कह नहीं पाई कभी
कि बहुत चाहती हूँ तुम्हें
अब जाना..
डर ही है ...
कहीं किसी कोने में
दिल के